December 4, 2020

कोरोना को क्रिकेट का ठेंगा, बाकी खेल -कायर कहीं के!

India vs Australia 2020 series

क्लीन बोल्ड/राजेन्द्र सजवान

भारत और ऑस्ट्रेलिया की क्रिकेट टीमें एक दूसरे को डरा धमका रही हैं। दोनों के अपने अपने दावे हैं। यह तो वक्त ही बताएगा कि जीत किसकी होती है लेकिन जब दो योद्धा भिड़ेंगे तो एक जीतेगा और दूसरे को हार का सामना करना पड़ेगा। यह भी संभव है कि मुकाबला बराबरी पर छूट जाए। फिर भी क्रिकेट की जीत तो निश्चित हो गई है।

कोविड 19 के चलते किसी भी खेल का आयोजन अपने आप में बड़ी चीज है। यूरोप, अमेरिका में फुटबॉल और कुछ अन्य खेल महीनों पहले शुरू हो चुके हैं, जिनके देखा देखी भारत में भी अब आईएसएल का आयोजन हो रहा है। लेकिन बाकी खेल क्रिकेट की तरह साहस नहीं दिखा पा रहे हैं। नतीजन क्रिकेट ने कोरोना काल में अन्य खेलों पर बड़ी बढ़त बना ली है। ऐसा नहीं है कि क्रिकेट में कोरोना के फैलाव का खतरा कम हो। लेकिन अन्य भारतीय खेलों की तुलना में क्रिकेट कहीं ज्यादा अनुशासित है। बोर्ड के इशारे पर उसकी तमाम इकाइयां और खिलाड़ी एक कतार में खड़े हो जाते हैं।

बेशक, क्रिकेट बोर्ड धनाढ्य है और अपने खेल से जुड़े हर अधिकारी और खिलाड़ी का पर्याप्त ध्यान रखता है। उसके पास प्रायोजकों की लंबी कतार लगी है जबकि बाकी खेल सरकार से मिलने वाली मदद के मोहताज हैं। एक अच्छी बात यह भी है कि क्रिकेट अपने नये पुराने सभी खिलाड़ियों को आर्थिक सहायता देने में कभी पीछे नहीं रहा। दूसरी तरफ अन्य खेलों के कई चैंपियन दाने दाने के लिए तरस रहे हैं।

हैरानी वाली बात यह है कि 2020 के स्थगित ओलंपिक खेलों के लिए अब चंद महीने बचे हैं। हमारे खिलाड़ी कोरोना काल के तमाम नियम कानूनों और शर्तों का पालन करते हुए कहाँ और कैसी तैयारी कर रहे हैं कोई नहीं जानता।

दूसरी तरफ क्रिकेट ने आईपीएल के रूप में अपना सबसे बड़ा , प्रसिद्ध और करोड़ों का आयोजन सफलता पूर्वक आयोजित कर बाकी खेलों पर जोरदार तमाचा जड़ दिया है। और बेचारे ओलंपिक खेल, मैदान तक नहीं छू पा रहे हैं। यह सही है कि खतरा बड़ा है लेकिन यह भी सही है कि क्रिकेट ने बाकी भारतीय खेलों की बोलती बंद कर दी है। यह भी साबित हो गया है कि एक अकेले क्रिकेट बोर्ड ने देश के खेल मंत्रालय, ओलंपिक संघ और तमाम खेल संघों को हैसियत का आईना दिखा दिया है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्रिकेट गतिविधियां जोरशोर से शुरू हो चुकी हैं तो देश भर में क्रिकेट के बड़े छोटे आयोजन भी रफ्तार पकड़ चुके हैं। लेकिन बाकी खेल इसलिए बिलों में घुसे हुए हैं क्योंकि उनके पास कोई ठोस योजना नहीं है।

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